परिवरतन

 

किसी नगर म एक बपरवा अभिमानी नवयवक रहता था । उस का नाम था सईद, वह बहत सनदर था – उस का रग था, चहरा-मोहरा भी अचछा था और आखो म मोहनी थी । परनत वह बडा मरख था ।

जब भी वह बाजार जाता तो रासत म उस एक बढा फकीर मिलता था । उस की कर झक गयी थी । उस क सिर, दाढी और मछो का बाल सफद हो चक थ । और आखो म बढाप की उदासीनता थी । न चान कयो सईद उस दख कर हसा करता था । एक दिन सईद न सवपन म दखा कि वह बढा हो गया ह और उस की कमर झक गयी ह । उस क सिर क, दाढी और मछो क बाल सफद हो चक ह और आथो म यौवन की चमक क सथान पर बढाप की उदासीनता अ गयी ह । जब वह जागा, तो वह अपन सवपन पर दर तक हसता रहा ।

अगल दिन जब वह बाजार गया तो उस वही बढा फकीर मिला । परनत इस बार सईद उस दख कर नही हसा । सईद न उस क निसतज मख क दरपण म अपनी जवानी की छाया दखी ।

       किसी नगर म एक यवक रहता ह । उस का नाम सईद ह । अब वह न मरख रहा और न किसी बढ को दखकर हसता ह ।


다 외워야함.. ㅠㅠ